Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
कल्पान्तेषु महाबुद्धे वहत्सूत्पातवायुषु ।
प्रपतत्स्विन्दुभार्केषु कथं तिष्ठसि विज्वरः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज
वसिष्ठजी ने कहा : हे महाबुद्धि पक्षिराज, कल्पान्त हेतु उत्पातवायुओं के, जो चन्द्रमा, नक्षत्र और
सूर्य को गिरा देते हैं, बहने पर तुम चिन्तानिर्मुक्त होकर कैसे रहते हो ? (क्योंकि उस समय प्रलय
में भूलोकपर्यन्त सबका दाह होने से मेरु, कल्पवृक्ष आदि से कभी भी परित्राण नहीं हो सकता ।)