Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
सुरापं ब्राह्मणं मत्तं निषिद्धसुरशूद्रकम् ।
बहुनाथसतीकं च कंचित्सर्गं स्मराम्यहम् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
कलियुग की सृष्टि-स्थिति का स्मरण कर रहे पक्षिराज भुशुण्ड कहते हैं।
एक समय एेसी उन्मत्त सृष्टि थी कि जिसमें ब्राह्मण लोग मद्य पीते थे, देवताओं की निन्दा करनेवाले
असत्-शूद्र रहते थे, स्त्रियों के अनेक पति होते थे ~ इसका मुझे स्मरण है