Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verses 50–51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, verses 50–51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 50,51
संस्कृत श्लोक
कल्पनं पार्थिवानां च वेदानयनमेव च ।
मन्दरोन्मूलनं चाब्धेरमृतार्थं च मन्थनम् ॥ ५० ॥
अजातपक्षो गरुडः सागराणां च संभवः ।
इत्यादिका याः स्मृतयः स्वल्पातीतजगत्क्रमाः ।
बालैरपि हि तास्तात स्मर्यन्ते तासु को ग्रहः ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
बाद में देव, दानव, मनुष्य आदि प्रत्येक में राजाओं की कल्पना की गई । पश्चात् मत्स्यरूप ग्रहण कर
भगवान वेद लाये। मन्दराचल का उन्मूलन किया गया | अमृत के लिए क्षीर-सागर का मंथन हुआ। बाद
में अजातपक्ष गरुड और समुद्रों की उत्पत्ति हुई-इत्यादि स्वल्प अतीत जगत्क्रम की जो स्मृतियाँ हैं,
उनका मेरी अपेक्षा अल्प-आयुवाले वर्तमान काल में उत्पन्न आपके सदृश प्राणी भी स्मरण करते हैं,
इसलिए उनमें आदर ही क्या