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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verses 47–48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, verses 47–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 47,48

संस्कृत श्लोक

सर्गप्रारम्भकलना विभागो भुवनत्रये । कुलपर्वतसंस्थानं जम्बूद्वीपं पृथक्स्थितम् ॥ ४७ ॥ वर्णधर्मधियां सृष्टिविभागो मण्डलावनेः । ऋक्षचक्रकसंस्थानं ध्रुवनिर्माणमेव च ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज, एक समय की सृष्टि में न इन्द्र था, न कोई राजा था, न उत्तम, मध्यम एवं अधम का भेद था, सब एकरूप था तथा समस्त दिक्‌-चक्र अन्धकार से व्याप्त था - इसका मुझे स्मरण है ॥४ ६॥ इस कल्प के वृतान्त का तो इस कल्प तक की आयुवाले बहुत से लोगों को स्मरण है, यों प्रपंच कर रहे पक्षिराज भुशुण्ड कहते हैं। महाराज, पहले सृष्टि के उत्पादन के लिए सृष्टि का संकल्प हुआ। उसके बाद तीन लोकों में द्वीप आदि अवान्तर प्रदेशों का विभाग हुआ | उसके बाद सात कुलपर्वतों के लिए योग्य स्थान की कल्पना हुई । उसके बाद पृथक्‌ स्थित हुए जम्बूद्वीप में प्रवेश कर स्रष्टा ने ब्राह्मण आदि वर्ण, उनके धर्म एवं उन-उनके लिए योग्य विद्याविशेषों की सृष्टि की । उसके बाद मण्डलरूप में पृथ्वी का विभाग किया, तदनन्तर नक्षत्र-चक्र का उपयोगी संस्थान एवं ध्रुव-मण्डल का निर्माण किया (मेरी अपेक्षा अत्यन्त स्वल्प आयुवाले आपके सदृश इस कल्प के मनुष्य भी इन सबका स्मरण कर सकते हैं।)