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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

वृक्षनीरन्ध्रभूपीठमकल्पितमहार्णवम् । स्वयसंजातपुरुषं कंचित्सर्गं स्मराम्यहम् ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

आश्वयान्तिर कहते हैं। महाराज, मुझे किसी एक ऐसी सृष्टि का स्मरण है कि जिसमें यह भूपीठ वृक्ष से घनीभूत था, महासमुद्र की कल्पना भी नहीं की गई थी ओर स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध के बिना अपने आप भृगु आदि मानस पुरुष उत्पन्न हुए थे (समुद्र के सर्जक प्रियव्रत की उत्पत्ति के पहले यह मानस-सरृष्टि हुई थी, यह प्रसिद्ध है)