Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 10
44 verse-groups
- Verse 1नौर्वोँ सर्म समाप्त दसवाँ सर्ग अविद्या से बन्धन की भ्रान्ति के द्वारा स्थावर पदार्थो में…
- Verse 2जिस परब्रह्म मे भाव अभावात्मक (उत्पत्ति-विनाशात्मक) कुछ भी कल्पना नहीं हो सकती, उसी परब्र…
- Verse 3हे श्रीरामजी, जिस प्रकार विमर्श करने पर रज्जु में हुए सर्पविभ्रम से किसी भी सर्पं की उपलब…
- Verse 4भली प्रकार अपरिज्ञात अर्थात् न जाना हुआ आत्मा (ब्रह्म) ही जगत्भ्रान्ति को प्राप्त हुआ ह…
- Verse 5चेत्य के बीजभूत मल का सत्ता के आरोप से आश्रय करती हुई चिति ही जगत में अविद्या नाम से कही…
- Verse 6इस प्रकार अविद्या का स्वरूप बतलाकर अब अविद्या-कार्यरूप उपाधि से आत्मा में बन्ध का विभ्रम…
- Verse 7इसी प्रकार गति, स्थिति आदि चित्तधर्मों का भी अपनी आत्मा में पुरुष आरोप कर लेता है, यों कह…
- Verse 8इसीलिए वह चित्तगत वासनाओं से अपने को बाँधता है, यों कहते हैं। चूँकि यह चित्त बाल यानी विव…
- Verse 9पूर्वश्लोक मे बालपदोक्त अविवेक के प्रसंग से, अविवेक की चरमसीमाभूत स्थावरो की चित्तस्थिति…
- Verse 10महाराज वसिष्ठजी ने कहा : अमनस्त्व को यानी सुषुप्ति की नाई सुख -दुःख संवेदन की अयोग्यता के…
- Verse 11हे ज्ञातव्य (ब्रह्म) के जाननेवालों में सर्वश्रेष्ठ श्रीरामजी, चित्अचित् का विवेक करने म…
- Verse 12ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रियों के व्यापारों से शून्य होकर यदि सत्तामात्र से चिति स्थावर…
- Verse 13शास्त्रविहित कर्मो के अनुष्ठान से हुई चित्तशुद्धि ओर साधनचतुष्टय की सम्पत्ति से सहकृत श्र…
- Verse 14आत्मतत्त्व को जानकर वासनाओं का जो उत्तम यानी अशेष परित्याग हे, उसे ही सत्तासामान्यरूप मोक…
- Verse 15ब्रह्मवेत्ता गुरु आदि के साथ शास्त्रों का विचार कर अध्यात्मभावना से अर्थात् मननपूर्वक नि…
- Verse 16स्थावर शरीरो में वह पद अत्यन्त दूर है, इसका उपपादन करते है । श्रीरामजी, जहाँ भीतर बीज में…
- Verse 17जिसके भीतर मानस व्यापाररूप मनन भली प्रकार लीन हो गया है तथा चारों ओर से जिसमें वासनाएँ ति…
- Verse 18पत्थर की नाई व्यापारशून्य ये सभी स्थावर आदि पदार्थ 'सुषुप्त” नाम को प्राप्त होने के कारण…
- Verse 19स्थावर आदि में वासना ही नहीं रहती, इस प्रकार किसी मन्दमति की शंका का परिहार करते हैं। हे…
- Verse 20जहाँ वासना का बीज विद्यमान है, वह सुषुप्ति जन्म के लिए ही है, सिद्धि के लिए नहीं है और जि…
- Verse 21अतएव स्वल्प भी वासना यदि अवशिष्ट रहे, तो अग्नि आदि के शेष की नाई क्रमश: वह बढ़कर महान अनर…
- Verse 22ज्ञानाग्नि से निःशेष भस्म किया गया वासनाबीज से जिसने सत्तासामान्यरूपता प्राप्त कर ली है,…
- Verse 23स्थावरादि समस्त पदार्थ मेँ चित् को आवृत करनेवाली चित्-शक्तिरूपा बीजस्वरूप वासना धान्याद…
- Verse 24वही चितृशक्त्ि बीज आदि आदि सभी कारणों मे नानारूपे स्थित है, यों कहते हैं। वही चित्शक्ति…
- Verse 25ओर भस्म तथा धूलियों में प्राक्तन काष्ठ, पाषाण आदि के ध्वंसरूप तथा परमाणुरूप से, मलिनो में…
- Verse 26घट, पट आदि सभी पदार्थो में आत्मा ही सत्तासामान्यरूपका ग्रहण कर जलाहरण, शीतनिवारण आदि नाना…
- Verse 27मेघजाल ही जिसका आच्छादक है, ऐसी वर्षा ऋतु जिस प्रकार आकाश को सर्वतः व्याप्त कर स्थित रहती…
- Verse 28हे श्रीरामजी, इस अज्ञानावृत चित्शक्ति का यह अत्यन्त विचारा गया स्वरूप, जो असत्यभूत मायाव…
- Verse 29हे श्रीरामजी, आत्मदर्शन के विरोधी अज्ञान से आवृत हुई यह आत्मदुष्टिरूपा चित्शक्ति संसाररू…
- Verse 30इस आत्मदृष्टि का जो अदर्शन (आत्मसाक्षात्कारविरोधी आवरणस्वरूप अदर्शन) है, उसे विद्वान लोग…
- Verse 31आवरण आदि स्वरूप से शून्य यानी निस्तत्त्वरूप से अविद्या का ज्यों ही साक्षात्कार किया जाता…
- Verse 32अन्यान्य भी दृष्टान्त बतलाते हैं। जिस प्रकार जिसकी नींद गलितावस्थ हो रही है, ऐसा पुरुष ज्…
- Verse 33रज्जु आदि के तत्त्व का पर्यालोचन करने पर होनेवाली सपदि भम की निवृत्ति भी प्रस्तुत स्थल मे…
- Verse 34अंधकार का स्वरूप देखने की इच्छा से यदि कोई हाथ में दीपक लेकर आवे तो जैसे सम्पूर्णं तम नष्…
- Verses 35–36तमोरूप अदर्शन दृष्टान्त का ही विस्तृतरूप से विवेचन करते हैं । दीप लाने पर जिस प्रकार अन्ध…
- Verse 37वह अवस्तु क्यो है ? इस आशंका पर अपना अनुभव ही उसके अवस्तु होने में प्रमाण है, यों कहते है…
- Verse 38शुक्ति और रज्जु आदि अथवा रजत एवं सर्प आदि कोई भी वस्तु जब तक विचार कर नहीं देखी जाती, तब…
- Verse 39किस प्रकार विचार कर देखना चाहिए, यह कहते है। रक्त, मांस तथा अस्थिमय इस देहयन्त्र में “मे…
- Verse 40उस प्रकार के विचारवाले मन से आदि-अन्तवाले में असद्रूप सम्पूर्ण दृश्यमात्र का परिहार हो जा…
- Verse 41वह शेषरूप ब्रह्म अविद्या के आवरणदशा में किंचित् वस्तुस्वरूप से प्रतीत नहीं होता, उसकी ना…
- Verse 42बाध्य जगत की स्वरूपशून्यता अथवा उसके वाध की आत्ममात्ररूपता मानने में प्रमाणान्तर की अन्वे…
- Verse 43अविद्यानाम की वस्तु भी नहीं है, यह सब जगत अखण्डित ब्रह्मस्वरूप ही है, जिसने सत् एवं असत्…
- Verse 44ऐसी अवस्था मे अविद्या ओर उसके क्षय का फलित निष्कृष्टस्वरूप कहते हैं। थह सम्पूर्ण जगत ब्रह…
- Verse 45उक्त अर्थ का ही विवरण कर रहे महाराज वसिष्ठजी प्रस्तुत विषय का उपसंहार करते हैं। हे श्रीरा…