Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
वासनायास्तथा वह्नेर्ऋणव्याधिद्विषामपि ।
स्नेहवैरविषाणां यः शेषः स्वल्पोऽपि बाधते ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव स्वल्प भी वासना यदि अवशिष्ट रहे, तो अग्नि आदि के शेष की नाई क्रमश: वह बढ़कर
महान अनर्थ की जनक होती है, अतः उसका निःशेष क्षय करना चाहिए, इस आशय से कहते हैं।
वासना का तथा अग्नि, ऋण, व्याधि और शत्रु का, स्नेह, विरोध एवं विष का जो शेष है, वह स्वल्प
होने पर भी हानि पहुँचाता है