Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verses 35–36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 35,36
संस्कृत श्लोक
नच संलक्ष्यते दीपे तमसो रूपनिश्चयः ।
उदेति केवलं ध्वान्तध्वंसो विमलमूर्तिमान् ॥ ३५ ॥
एवमालोक्यमानैषा क्वापि याति पलायते ।
असद्रूपा ह्यवस्तुत्वाद्दृश्यते ह्यविचारणात् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
तमोरूप अदर्शन दृष्टान्त का ही विस्तृतरूप से विवेचन करते हैं ।
दीप लाने पर जिस प्रकार अन्धकार के स्वरूप का निश्चय नहीं होता, किन्तु विशुद्ध स्वरूपवाला
गाढ़ अन्धकार का नाश ही केवल उदित होता है, उसी प्रकार उक्त रीति से मन्द-विचार करने पर यह
अविद्या मन्द हो जाती है और अच्छी तरह विचार करने पर न मालूम कहाँ भाग जाती है, यह अवस्तु
अर्थात् कोई चीज न होने से असद्रूप है और विचार न करने से ही दीख पडती है