Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अमनस्त्वमसंप्राप्तं मनस्त्वादपि च च्युतम् ।
तटस्थं रूपमाश्रित्य स्थितैषा स्थावरेषु चित् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : अमनस्त्व को यानी सुषुप्ति की नाई सुख -दुःख संवेदन की अयोग्यता
के सम्पादक मन के लय को प्राप्त न हुए तथा पूर्वापर के विचार में समर्थ मननयोग्यरूप मनस्त्व से च्युत
हुए मनस्त्व-अमनस्त्व के मध्यवर्ती मुग्धता रूप का आश्रय कर यह जीवचिति स्थावरो में रहती हे