Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
मौर्ख्यमत्यन्तघनतामागतं समवस्थितम् ।
स्थावरादि तनु प्राप्तं कीदृशं भवति प्रभो ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वश्लोक मे बालपदोक्त अविवेक के प्रसंग से, अविवेक की चरमसीमाभूत स्थावरो की चित्तस्थिति
जानने की इच्छा कर रहे श्रीरामजी महामुनि वसिष्ठजी से पूछते हैं ।
श्रीरामजी ने कहा : हे प्रभो, अत्यन्त घनीभाव को प्राप्त हुआ अविवेक (अज्ञान) स्थावर आदि
शरीर को प्राप्त होता हुआ किस प्रकार अवस्थित रहता हे, यह कृपा कर कहिए