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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

यथा कीदृगवस्त्वेतदिति यावद्विकल्प्यते । अविद्या क्षीयते तावदालोकेनान्धता यथा ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

रज्जु आदि के तत्त्व का पर्यालोचन करने पर होनेवाली सपदि भम की निवृत्ति भी प्रस्तुत स्थल में दृष्टान्त है, इस आशय से कहते है। ज्यों ही सर्पादि वस्तु का स्वरूप किस प्रकार का है -अर्थात्‌ वह वास्तविक हे या भ्रान्ति से केवल कल्पित है - यों विचार करते हैं, त्यों ही सर्पादि का भ्रम उस प्रकार नष्ट हो जाता है, जिस प्रकार प्रकाश से अन्धकार द्वारा सम्पादित दर्शनशक्ति के प्रतिबन्ध का नाश होता है