Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
तस्मान्नकिंचिदेवेदं जगत्स्थावरजंगमम् ।
नकिंचिद्भूततां प्राप्तं यत्किंचिदिति विद्धि हे ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
नौर्वोँ सर्म समाप्त
दसवाँ सर्ग
अविद्या से बन्धन की भ्रान्ति के द्वारा स्थावर पदार्थो में मन की स्थिति तथा
बुद्धिपूर्वक विचार से बन्ध का मोक्ष, इसका वर्णन |
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, चूँकि जगत और जीव का भेद अज्ञात ब्रह्मस्वरूप ही है -
इसलिए ब्रह्म का ज्ञान हो जाने पर जो कुछ भी यह सब स्थावर-जंगमरूप जगत प्रतीत होता है, यथार्थ
में वह कुछ भी नहीं है, कुछ भी पदार्थ भूतरूपता को प्राप्त नहीं हुआ है, यह आप जानिए