Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
यावन्नालोक्यते तावन्न किंचिदपि दृश्यते ।
आलोकिते यथाऽविद्या तत्तथा प्रतिपद्यते ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
शुक्ति और
रज्जु आदि अथवा रजत एवं सर्प आदि कोई भी वस्तु जब तक विचार कर नहीं देखी जाती, तब तक वह
यथार्थरूप से नहीं दीख पड़ती और विचारपूर्वक देखने पर जिस स्वरूपकी अविद्या ओर जिस तरह
वस्तुत्त्व रहता है, वह उसी तरह दीख पडता है