Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
अविद्या रूपरहिता यावदेवावलोक्यते ।
तावदेव गलत्याशु तुहिनाणुर्यथातपे ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
आवरण आदि स्वरूप से शून्य यानी निस्तत्त्वरूप से अविद्या का
ज्यों ही साक्षात्कार किया जाता है, त्यों ही तुरन्त वह उस प्रकार गल जाती है, जिस प्रकार धूप में
तुषार का परमाणु गल जाता है