Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
अपरिज्ञात आत्मैव भ्रमतां समुपागतः ।
ज्ञात आत्मत्वमायाति सीमान्तः सर्वसंविदाम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
भली प्रकार अपरिज्ञात अर्थात् न जाना हुआ आत्मा (ब्रह्म) ही जगत्भ्रान्ति को प्राप्त हुआ है और
भली प्रकार परिज्ञात होने पर वह जीवादि-संविद् की सीमा की अन्तभूत आत्मरूपता को प्राप्त करता
हे