Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
यत्र काचिन्न कलना भावाभावमयात्मिका ।
तदिदं राम जीवादि सर्वं व्यर्थं किमीहसे ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस परब्रह्म मे भाव अभावात्मक (उत्पत्ति-विनाशात्मक) कुछ भी कल्पना नहीं हो सकती, उसी
परब्रह्म के स्वरूपभूत ही जीव आदि सब कुछ प्रतीयमान पदार्थ हैँ, अतः हे श्रीरामजी, आप निरर्थक
मिथ्या पदार्थो की क्यों अभिलाषा करते हैं ?