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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 42

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 42

संस्कृत श्लोक

रूपं स्वनाम्न एवास्या ज्ञायते निःस्वभावकम् । नहि जिह्वागतस्वाद्यस्वादोऽन्यस्मात्प्रतीयते ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

बाध्य जगत की स्वरूपशून्यता अथवा उसके वाध की आत्ममात्ररूपता मानने में प्रमाणान्तर की अन्वेषणा नहीं होनी चाहिए, क्योकि माया अविद्या आदि नाम स्वरूपशून्य, बाध्य, स्वप्नावस्था में अनुभूयमान पदार्थो में ही रूढ हैं, यों कहते हैं। अविद्या ' इस अपने नाम से ही इसके स्वभावरहित रूप का ज्ञान हो जाता है, जैसे जिह्वागत आस्वाद्य पदार्थों का रस और किसी दूसरे से प्रतीत नहीं होता