Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
बुद्धिपूर्वं विचार्येदं यथावस्त्ववलोकनात् ।
सत्तासामान्यबोधो यः स मोक्षश्चेदनन्तकः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
शास्त्रविहित कर्मो के अनुष्ठान से हुई चित्तशुद्धि ओर साधनचतुष्टय की सम्पत्ति से सहकृत श्रवण,
मनन एवं निदिध्यासन से उत्पद्यमान तत्वसाक्षात्कार से जनित समूल वासनाक्षय एवं मनोनाश से हुई
एकमात्र सत्तासामान्यरूप से चिति की स्थिति ही मोक्ष है, वह मोक्ष अनन्त पापरूप दुर्वासना बीजों से
भरे हुए नारकीय स्थावरों को, शास्त्राधिकार योग्य जन्म दुर्लभ होने से अत्यन्त दुर्लभ है, इस प्रकार
महाराज वसिष्ठजी अपनी उक्ति का अभिप्राय वर्णन करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, शास्त्रों का बुद्धिपूर्वक विचार कर, आत्मा के यथार्थ अवलोकन से
अर्थात् साक्षात्कार से जो सत्तासामान्य बोध होता है, वही अविनाशी मोक्षपद कहलाता हे