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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, Verse 45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 10, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

घटपटशकटावभासजालं न विभुरितीत्युदितेह सा त्वविद्या । घटपटशकटावभासजालं विभुरिति चेद्गलितैव सा त्वविद्या ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त अर्थ का ही विवरण कर रहे महाराज वसिष्ठजी प्रस्तुत विषय का उपसंहार करते हैं। हे श्रीरामजी, घट, पट, शकट आदि रूप से अवभासमान यह जगज्जाल “अपरिच्छिन्न सच्चिदानन्द ब्रह्मस्वरूप नहीं है, किन्तु उससे अन्य है” यों आरोपित निश्चय यदि हुआ, तो अविद्या उदित हुई- यह आप जानिए, और इसकी अपवाद-भूत घट, पट, शकट आदि रूप से भासमान यह जगज्जाल "अपरिच्छिन्न सच्चिदानन्द ब्रह्मरूप ही है, उससे भिन्न नहीं” यों अपरिच्छिन्न सन्मात्र दृष्टि यदि उदित हुई, तो अविद्या गलित हुई यानी उसका क्षय हुआ - ऐसा आप जानिए