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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 81

उन्‍नासीवाँ सर्ग समाप्त अस्सीवाँ सर्ग॑ जिस विचार के सुदृढ़ होने पर संमुख स्थित भी दिव्य भोगों में इच्छा उत्पन्न नहीं होती, उस विचार का वर्णन |

44 verse-groups

  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी अपने हृदय में विचार (आगे कहा जानेवाला विचार) कर रहे…
  2. Verse 2उसमें पहले जिस स्थल में चक्षु के द्वारा इष्ट एवं अनिष्ट विषय गृहीत होने पर चश्च मे अहन्ता…
  3. Verse 3जीव का स्वामित्व केवल चक्षु पर ही नहीं है, किन्तु कार्यकारणसमूह, काम, कर्म, वासना तथा उसक…
  4. Verse 4जीव का नेत्र पर स्वामित्व रहने से ही वह उसे रूप-मग्न होने से रोक सकता है, यह बतलाते है ।…
  5. Verse 5शंका हो कि तब किस प्रकार का प्राज्ञ करटो निबद्ध होता है, तो उस पर कहते है । तेज बुद्धिवाल…
  6. Verse 6हे नेत्र, जो उत्पन्न होकर विनष्ट हो जाता है ओर जो केवल ऊपर-ऊपर से ही रमणीय प्रतीत होता है…
  7. Verse 7हे नेत्र, जब किसी की अपेक्षा किये बिना समस्त अर्थो के प्रकाशन में सदा समर्थ परमात्मा रूप…
  8. Verse 8इसलिए तुम भी साक्षी की तरह स्थित सद्रूप को देखो, यह भाव है । सम्प्रति चक्षु के द्वारा भान…
  9. Verse 9चक्षु के द्वारा दृष्ट पदार्थाकार वृत्ति चित्त में भले ही हो, तथापि उसमें अभिनिवेश के हेतु…
  10. Verse 10हे चित्त, आधारआधेयभूत तथा जडस्वरूप प्रकाश और रूप के परस्पर स्फुरित होने पर तुम निरर्थक ही…
  11. Verse 11प्रकाश और रूप के साथ चित्त का सम्बन्ध ही नहीं है , इस विषय को दृष्टान्त से स्पष्ट करते है…
  12. Verse 12वास्तव में असम्बद्धं होने पर भी जो सम्बद्धत्व भ्रान्ति होती है, उसमें ज्ञान ही निमित्त है…
  13. Verse 13जैसे दो काठ लाख से एक दूसरे से श्लिष्ट हो जाते हैं, वैसे ही ये रूप, प्रकाश और संकल्प आदि…
  14. Verse 14मकड़ी के जाले के समान आप ने ही बन्धन में हेतुभूत अपने चित्त के संकल्प विकल्पात्मक तन्तु म…
  15. Verse 15अज्ञान के विनाश से क्षीण हुए मन में फिर ये रूप, प्रकाश ओर मनस्कार परस्पर एक दूसरे से कोई…
  16. Verse 16पहले यत्न से तो चित्त का उच्छेद कर देना चाहिए, ऐसा कहते हैं। चित्त ही सभी इन्द्रियो का भी…
  17. Verse 17अब ललकार कर चित्त को ही बोधित करते हैं। हे चित्त, तुम मिथ्या ही प्रलाप करते हो, मेने तुम्…
  18. Verse 18हे चित्त, तुम इन्द्रियो से सम्बद्ध शब्द आदि पाँच आकारो के द्वारा अपने भीतर क्या गरजते हो,…
  19. Verse 19हे दुष्ट चित्त, तुम्हारा गर्जन मेरे लिए तनिक भी हर्ष ओर विषाद के लिए नहीं है, एेन्द्रजालि…
  20. Verse 20हे चित्त, तुम रहो चाहे जाओ, तुम न तो मेरे हो ओर न तुम जीते हो । अपने मिथ्यास्वभाव से तुम…
  21. Verse 21हे चित्त, तुम तत्त्वरहित जड, भ्रान्त ओर शठ हो, तुम्हारा आकार अत्यन्त असत्‌ है, अज्ञानस्वर…
  22. Verse 22हे चित्त "तुम तत््वशून्य हो" यह आज तक हम लोगों ने नहीं जाना था । आज आत्मतत्त्वदर्शन के प्…
  23. Verse 23हे चित्त, तुम शठ के द्वारा दीर्घकाल तक अवरुद्ध मेरा सम्पूर्ण देहरूपी घर शम, दम, विचार, प्…
  24. Verse 24हे चित्त, प्रेत के सदृश आकारवाले जड तुम्हारे मनरूपी शठ के चले जाने पर मेरा देहरूपी यह घर…
  25. Verse 25हे जगत्रूपी चित्तवेताल, शठरूप तुम पहले ही नहीं थे, वर्तमानकाल में भी नहीं हो ओर आगे भी नह…
  26. Verse 26यदि तुम को लज्जा है तो तुम मेरे घर से बाहर निकल जाओ, ऐसा कहते है। हे चित्तरूपी वेताल, तृष…
  27. Verse 27हे चित्त, भाग्यवश केवल आत्मा ओर अनात्मा के विवेकमात्र से तुम प्रमत्त चित्तरूपी वेताल मेरे…
  28. Verse 28चित्त के द्वारा ठगे गये पुरुषो के विषय में शोक करते है । बड़े आश्चर्य की बात है कि महान्‌…
  29. Verse 29हे चित्त, मनुष्यों के बीच में मरनेवाले देह में आत्मबुद्धि रखनेवाले स्वतः मृत मनुष्य के प्…
  30. Verse 30हे अज्ञानी गरीब चित्त, मैं आज तुमको मारता नहीं हूँ यानी तुम्हारा वध नहीं करता, क्योकि तुम…
  31. Verse 31हे चित्त, इतने काल तक तुम्हारा अस्तित्व (स्वरूपसत्ता) जीवित की नाईं था, यह जानकर चिरकाल त…
  32. Verses 32–33चित्त निस्तत्त्व है, अतः: उसका अस्तित्व हो ही नहीं सकता- यह मैंने आज जान लिया, इसलिए तुम्…
  33. Verses 34–36भाग्यवश चित्त निस्तत्त्व है, यह मैंने आज स्वयं जान लिया। बोध के अनन्तर जीवन्युक्तों को चि…
  34. Verses 37–38चिरकाल तक चित्तरूपी वेताल के द्वारा ठगे गये उसके स्वरूपभूत मैंने अनेक तरह के विकारों को उ…
  35. Verse 39विचाररूपी मन्त्र से मन मर गया, चिन्ता मर गई और अहंकाररूपी राक्षस भी मर गया, अब समस्त विषम…
  36. Verse 40अव अवशिष्ट निरतिशयआनन्दैकरसस्वरूप आत्मा को श्रद्धातिशय से नमस्कार करते है। एक, कृतकृत्य,…
  37. Verses 41–42मुझे न तो शोक है और न मोह है न में अहम्‌अभिमान प्रधान जड़- अंशस्वरूप ही स्वयं हूँ। मैं अह…
  38. Verse 43न मुझे इच्छा है, न मेरे कर्म हैं, न मेरा संसार है, न मुझमें कर्तृत्व हैं, न मुझमें भोक्तृ…
  39. Verse 44मैं ही आदि यानी भुवनों का कारण हूँ, मँ ही धाता यानी धारणकरनेवाला हूँ, मैं चित्तस्वरूप हूँ…
  40. Verse 45विकारशून्य, नित्य, अंशशून्य, विशालतम, सर्वस्वरूप तथा सर्वकालात्मक यानी सनातन मद्रूप आत्मा…
  41. Verse 46रूपशून्य, नामशून्य, प्रकाशरूप, महदाकृति तथा स्वयं एक आत्ममात्र में स्थिति रखनेवाले मद्रूप…
  42. Verse 47मैं सर्वत्र समरूप, सर्वत्र व्यापक, सूक्ष्म और जगत्‌ को एकमात्र प्रकाशित करनेवाली सत्ता को…
  43. Verse 48पर्वत, समुद्र, पृथ्वी, नदी इनसे युक्त प्रसिद्ध यह वर्तमान दृश्य श्री मद्रूप है ही नहीं, इ…
  44. Verse 49चूँकि मन के समस्त विकल्प विनष्ट हो चुके हैं, इसलिए सम और अत्यन्त अभिराम, समस्त विश्व का आ…