Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
प्रविचार्य स्वसंस्थेन स्वस्थेन स्वेन चेतसा ।
तिष्ठन्ति विगतोद्वेगं सन्तः प्रकृतकर्मसु ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे चित्त, तुम इन्द्रियो से
सम्बद्ध शब्द आदि पाँच आकारो के द्वारा अपने भीतर क्या गरजते हो, जो तुम्हारा अभिमान करनेवाला
प्रमाता तुम्हें "यह मेरा है” इस रूप से जानता है, उसी के विषय मेँ तुम उपकरणरूप से गरज सकते हो,
परन्तु असंग, उदासीन, चिदेकरस मेरे विषय में तुम नहीं गरज सकते