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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, Verses 37–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 37

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

चिरकाल तक चित्तरूपी वेताल के द्वारा ठगे गये उसके स्वरूपभूत मैंने अनेक तरह के विकारों को उत्पन्न किया; अब मैं स्वयं पदार्थभूत होकर उन विकारों का स्मरण कर हँसता हूँ॥ ३ ५॥ भाग्यवश बहुत काल के अनन्तर अब विचाररूपी तलवार से मर्दित चित्तरूपी वेताल को, जो तालवृक्ष के सदृश उत्तंग ऊँचाई से युक्त है, हृदय मन्दिर से हटा दिया ॥ ३ ६॥ चित्तरूपी वेताल के शान्त हो जाने पर और काम आदि मलों का अभाव होने से पवित्र पदवी के यानी इन्द्रियो के द्वारभूत मार्ग को प्राप्त करने पर अब उत्तम भाग्य से शरीररूपी नगर में केवल मैं सुखपूर्वक अवस्थित हूँ