Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
आत्मैवेदं जगदिति सत्यं चित्तेन मार्जितम् ।
उत्थितं स्यात्कुतश्चित्तमहो चित्तमवस्तु यत् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें पहले जिस स्थल में चक्षु के द्वारा इष्ट एवं अनिष्ट विषय गृहीत होने पर चश्च मे अहन्ता के
अभिमान से जीव को सुख-दुःख अनुभूत होते हैं; उस स्थल में चक्षु के प्रति जीव की स्वामिता ही है,
अहन्ता नहीं है, ऐसा विचार करने से जीव को दुःख आदि की प्राप्ति नहीं हो सकती, ऐसा दिखलाते हैं ।
नेत्र केवल रूप देखने में ही निमित्त है और चक्षु का स्वामी जीव तो केवल चक्षु में अहन्ता के
अभिनिवेश से सुख-दुःख का भोक्ता होता है। जैसे बैल बोझा ढोने के लिए ही है, उस ढोये हुए द्रव्य का
उपभोग करनेवाला तो द्रव्य का स्वामी है