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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

मौर्ख्यमोहभ्रमे शान्ते चित्तं नोपलभामहे । चक्रारोहभ्रमस्यान्ते पर्वतस्पन्दनं यथा ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

शंका हो कि तब किस प्रकार का प्राज्ञ करटो निबद्ध होता है, तो उस पर कहते है । तेज बुद्धिवाला प्राज्ञ पुरुष तो भीतर निवास कर रहे जिस चिदात्मा से बाह्य और आभ्यन्तर विषयों का उनके सम्बन्ध द्वारा प्रकाश होता हे, तथा जिस तथोक्त चिदात्मा से अनात्मभूत पाँच कोशो की परम्परा का आत्मा के तादात्म्य आरोप से अनुभव होता है, उस चिदात्मा के उदासीन तथा यथाप्राप्त पदार्थो के प्रकाशनरूप चरित्रं से अभ्यासवश सम्बद्ध होता है, मूर्खो की नाई तथाविध सौन्दर्यरूपी रूपकर्दम के आस्वादनरूप कर्मो से सम्बद्ध नहीं होता । तात्पर्य यह निकला कि श्रीरामजी, आप भी अपने उदासीन सत्‌स्वरूप का प्रकाशन कीजिए, उसका आस्वादन मत कीजिए