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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, Verse 17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

अश्नन्गच्छन्स्वपंस्तिष्ठन्निति राघव चेतसा । सर्वत्र प्रज्ञया तज्ज्ञः प्रत्यहं प्रविचारयेत् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

अब ललकार कर चित्त को ही बोधित करते हैं। हे चित्त, तुम मिथ्या ही प्रलाप करते हो, मेने तुम्हारे उच्छेद के लिए उपाय दढ निकाला है । तुम आदि ओर अन्त दोनों में नितान्त तुच्छ (असत्‌) हो, इसलिए वर्तमान काल में भी असत्‌ ही हो । पूर्व उत्तरकाल मेँ असत्‌ वन्ध्यापुत्र वर्तमान काल में सत्‌ नहीं हो सकता