Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
सिद्धः स्थाणुपरिस्पन्दो नौगतस्य यथा शिशोः ।
अबुद्धस्य न बुद्धस्य तथा चित्तमसन्मयम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जीव का नेत्र पर स्वामित्व रहने से ही वह उसे रूप-मग्न होने से रोक सकता है, यह बतलाते है ।
हे मूढतम नेत्र, रत्री, पुत्र आदि के सौन्दर्यस्वरूपात्मक कीचड़ का तुम आस्वाद मत करो, यह
तथोक्त रूप क्षण में ही नष्ट हो जायेगा और तुम्हें भी नष्ट कर डालेगा