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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

एकमेव जगच्छान्तं नानात्वं न सदित्यपि । किमन्यद्विमृशाम्यन्तः कथयैवालमेतया ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

हे चित्त, आधारआधेयभूत तथा जडस्वरूप प्रकाश और रूप के परस्पर स्फुरित होने पर तुम निरर्थक ही व्याकुल हो रहे हो । तात्पर्य यह है कि स्त्रीशरीर आदि रूप सूर्य आदि के प्रकाश का आश्रय लेकर स्फुरित होते हैं ओर सूर्यादि प्रकाश उक्त स्त्री-शरीरादिभूतरूप में आश्रित होकर स्फुरित होते हैं, यों परस्पर एक दूसरे का सम्बन्ध होने पर सुन्दरता की भ्रान्ति से कामादि दोष द्वारा चित्त में व्याकुलता होती है, यह प्रसिद्ध है । परन्तु प्रकाश और रूप का चित्त के साथ सम्बन्ध न होने के कारण वह व्यर्थ ही है