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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 78

छिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त ब सतहत्तरवाँ सर्ग मन्दारमाला की नाई विद्वानों को मस्तक और गले में धारण करने योग्य माला का जीवन्मुक्तों के गुणों से वसिष्ठजी द्वारा गुम्फन ।

42 verse-groups

  1. Verse 1श्रीरामजी ने कहा : हे मुनिवर, जिसने ब्रह्मतत्त्वरूप चमत्कार का अपरोक्ष साक्षात्कार कर लिय…
  2. Verse 2महाराज वसिष्ठ ने कहा : हे महाबाहो, अनेक बार मैंने आपसे जीवन्मुक्त के लक्षण कहे हैं, फिर भ…
  3. Verse 3भद्र जिसकी समस्त एषणाएँ यानी विषयाभिलाषाएँ निकल गई है, ऐसा आत्मवान्‌ (तत्त्ववित्‌) पुरुष…
  4. Verse 4जिसने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है, ऐसा आत्मज्ञानी पुरुष कैवल्य को प्राप्त हुआ-सा चारों ओ…
  5. Verse 5तत्त्वज्ञ पुरुष पहले चक्षु आदि से देखे गये ओर पीछे हाथ आदि से परिगृहीत हुए भी अन्न, वस्त्…
  6. Verse 6श्रीरामजी जो शान्त बुद्धि से सम्पन्न विद्वान्‌ है, वह अन्तरात्मा में लीन दृष्टि से यह जनत…
  7. Verse 7तत्त्ववित्‌ भविष्य की न अपेक्षा करता है, न वर्तमान मेँ अवस्थिति यानी समासक्ति करता है, न…
  8. Verse 8व्यावहारिक वस्तुओं के विषय में सुप्तप्राय होता हुआ भी अपनी आत्मा में जाग्रत रहता हे । भगव…
  9. Verse 9इसलिए उसकी स्थिति सदा ही एक-सी रहती है, ऐसा कहते है। अपने भीतर सम्पूर्ण वस्तुओं का परित्य…
  10. Verses 10–11जिसने बाहर से समस्त वस्तुओं की इच्छा की है, जो समयानुसार प्राप्त हुए तत्‌-तत्‌ देह, वर्ण…
  11. Verse 12प्रकृत तत्त्वज्ञ उदासीन पुरुष की नाई अवस्थित रहता है । परम्पराक्रम से सम्प्राप्त कर्मो मे…
  12. Verse 13जो तत्त्वज्ञ है, वह अनुकूल और प्रतिकूल आचरण में तत्पर प्राणी के ऊपर अनासक्त चित्त से, भक्…
  13. Verse 14यौवनवृत्तिवालों में युवा और दुःखितां मे दुःखी-सा रहता है
  14. Verse 15पूर्वोक्त बालादि के सदश आचरण करनेवाले तत्त्वज्ञो में जो विशेष है, उसे कहते हैं । तत्त्वज्…
  15. Verse 16प्राज्ञ, प्रसन्न और मधुर रहता है, अपनी प्रतिभा के उदय में पूर्ण, खेदरूपी दुर्गति से रहित…
  16. Verse 17तत्त्वज्ञ उदार चरित और उदार आकार से युक्त है, सम है, सौम्य सुख का समुद्र है, सुस्निग्ध है…
  17. Verse 18तत्त्वज्ञ महात्माओं को पुण्य कर्मो के अनुष्ठान से न कोई प्रयोजन है और न भोगों से एवं लौकि…
  18. Verse 19उसका न आवश्यक कार्यो के ओर एेहिक ओर पारलौकिक फल के हेतु कर्मो के आरम्भ से प्रयोजन सिद्ध ह…
  19. Verse 20तत्त्वज्ञ महानुभाव ने जब समस्त जगत की स्वरूपभूत अद्वितीय आत्मरूप यथार्थ वस्तु का भली प्रक…
  20. Verse 21सम्यक्‌-ज्ञानरूपी अग्नि से जिसके सन्देहरूपी जाल (पिंजडे) विनष्ट हो गये हैं, उस महात्मा का…
  21. Verse 22जिसका अन्तःकरण भ्रान्ति से विनिर्मुक्त होकर ब्रह्मस्वरूप हो गया हो, वह आकाश की नाई सभी दृ…
  22. Verse 23मन का यदि अभाव है, तो शरीर वेष्टा आदि की उपपत्ति कैसे हो सकती है 2 तो इस पर कहते है । दोल…
  23. Verse 24जिसका पुनर्जन्म मन्द हो गया है, ऐसा आनन्द-सागर में निमग्न तत्त्ववेत्ता, घूर्णमान शराबी की…
  24. Verse 25श्रीरामजी, जिसके समस्त अर्थ अनुपादेय हो गये हैं, ऐसा तत्त्ववेत्ता सब प्रकार से समस्त वस्त…
  25. Verse 26देश और काल के अनुसार प्राप्त हुए क्रियाकलापों एवं तत्‌-तत्‌ कार्यों में स्थित हुआ भी वह क…
  26. Verse 27तत्त्वज्ञ ऊपर-ऊपर से समस्त अर्थो को करता है, पर भीतर किसी प्रकार की इच्छा न रहने के कारण…
  27. Verse 28सन्निहित भी दुःखावस्था की उपेक्षा नहीं करता ओर न सुखावस्था की अपेक्षा ही करता हे । कार्यो…
  28. Verse 29यदि सूर्य शीतल प्रकाशवाला हो जाय चन्द्रमा का मण्डल तपने लग जाय, अग्नि की ज्वाला नीचे की ओ…
  29. Verse 30क्यो आश्वर्य-बुद्धि नहीं होती ? तो इस पर कहते है। चूँकि तत्त्ववेत्ता पुरुष यह जानता है कि…
  30. Verses 31–32तत्त्वज्ञ मुनि दया ओर दीनता का परिग्रह नहीं करता, न क्रूरता का आश्रय लेता है, न लज्जा का…
  31. Verse 33वह कभी भी दीनतायुक्त स्वरूपवाला नहीं होता, कभी उद्धत स्वरूपवाला नहीं होता । ओर न कभी प्रम…
  32. Verse 34जिसमें प्राणी अविरत मरते ओर उत्पन्न होते हैं, ऐसी जगत्‌ की स्थिति में कहाँ, किस प्रकार ओर…
  33. Verse 35जो कहा गया है उसका दृष्टान्त से समर्थन करते हैँ । जल में तरगजनित फेनो के वेगपूर्वक भ्रमण…
  34. Verse 36प्रातिभासिक जगत्‌ की दुष्टिरूपी सृष्टि में सक्षम नर यानी 'मैं ही अपनी आत्मा में जगद्रूप म…
  35. Verse 37श्रतिक्षणविपरिणामिनो हि सर्वे भावाः“ (समस्त घट आदि पदार्थ प्रतिक्षण परिवर्तनशील है) इस न्…
  36. Verse 38जो निरन्तर उत्पत्ति ओर निरन्तर विनाश से समन्वित है ऐसे दग्ध संसार में कारुण्य ओर आनन्द का…
  37. Verse 39यदि शंका हो कि प्रसिद्ध शुभ कर्मो के फलों के विद्यमान रहते उनके विरोधी पुत्र-वियोगजनित दु…
  38. Verse 40जो दुःखदशा सुखानुभव के बाद अपना अस्तित्व प्राप्तकर अपने कार्य शोक, मोह आदि कर्मो का विस्त…
  39. Verse 41सुख, दुःख दोनों के क्षीण हो जाने से हेय ओर उपादेय दोनों का भी विनाश तथा शुभ ओर अशुभ का वि…
  40. Verse 42उससे क्या हुआ ? इस पर कहते हैं। रम्य ओर अरम्य दृष्टि के निरास से भोग अभिलाषा के निवृत्त ह…
  41. Verse 43मन का भले ही विनाश हो जाय, इससे भी क्या हुआ ? इस पर कहते हैं। हे श्रीरामजी, तिलो के अत्यन…
  42. Verses 44–55हे श्रीरामजी, आत्मा से पृथक्‌ कुछ भी पदार्थ नहीं है, इस प्रकार की दृढ़ भावना के कारण यानी…