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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

द्वौ क्रमो चित्तनाशस्य योगो ज्ञानं च राघव । योगस्तद्वृत्तिरोधो हि ज्ञानं सम्यगवेक्षणम् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

व्यावहारिक वस्तुओं के विषय में सुप्तप्राय होता हुआ भी अपनी आत्मा में जाग्रत रहता हे । भगवान्‌ ने गीता में कहा भी है - या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यानी अज्ञजीवों के प्रति सर्वथा अज्ञात होने के कारण उनके लिए निशास्वरूप जो आत्मा है, उस में ज्ञानी पुरुष जागता रहता है । सब कुछ कर्म करता हे, तथापि भीतर से कुछ नहीं करता तात्पर्य यह हुआ कि व्यवहार में अत्यन्त कुशल भी वह प्रसुप्त ही रहता है, अतः व्यवहार कौशल से जनित फल से सम्बद्ध नहीं होता