Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
संविन्मात्रं तु हृदयमुपादेयं स्थितं स्मृतम् ।
तदन्तरे च बाह्ये च न च बाह्ये न चान्तरे ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
जो कहा गया है उसका दृष्टान्त से समर्थन करते हैँ ।
जल में तरगजनित फेनो के वेगपूर्वक भ्रमण में तथा प्राणियों की परम्परा में यह स्थिरता कहाँ ओर
कैसे हो सकती है ? इसलिए सुख-दुःख का प्रसंग क्या हो सकता है ?