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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

चित्तं प्राणपरिस्पन्दमाहुरागमभूषणाः । तस्मिन्संरोधिते नूनमुपशान्तं भवेन्मनः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त बालादि के सदश आचरण करनेवाले तत्त्वज्ञो में जो विशेष है, उसे कहते हैं । तत्त्वज्ञ मुनि जब-जब अपने मुख से वाणी को प्रवृत्त करते हैं, तब पवित्र कथाओं को ही कहते हैं बालक आदि की नाई व्यर्थ भाषण नहीं करते उनका अन्तःकरण दीनता से वर्जित रहता हे । वे धीरबुद्धिवाले, उदित आनन्द से युक्त तथा दक्ष रहते हैं और लोक में उसके पुण्य चरित्रों का वर्णन होता है