Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verses 10–11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, verses 10–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 10,11
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
देहेऽस्मिन्देहनाडीषु वातः स्फुरति योऽभितः ।
स्पन्देष्विव भुवो वारि स प्राण इति कीर्तितः ॥ १० ॥
तस्य स्पन्दवशादन्तः क्रियावैचित्र्यमीयुषः ।
अपानादीनि नामानि कल्पितानि कृतात्मभिः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसने बाहर से समस्त वस्तुओं की इच्छा की है, जो समयानुसार प्राप्त हुए तत्-तत् देह, वर्ण और
आश्रमों के उपयोगी कर्मो में तथा पिता, पितामह आदि क्रमपरम्परा से प्राप्त हुए राज्यादिकाम, बन्धुओं
के कार्य तथा दान, मान आदि कर्मो में केवल अनुवृत्ति रखनेवाला, समस्त सुख भोगों का जो आत्मस्वरूप
समझनेवाला अथवा समस्त सुख भोगों का स्वयं ही आत्मस्वरूप है, इसीलिए अज्ञानियों की दृष्टि में
भोगकाल में समस्त विषयाभिलाषाओं में अवस्थित तत्त्ववेत्ता समस्त कर्मो को करता है, परन्तु उसने
कर्तृत्वाभिमान का परित्याग कर रक्खा है