Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
सर्वेषामेव जन्तूनां संविद्धृदयमुच्यते ।
न देहावयवैकांशो जडजीर्णोपलोपमः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रतिक्षणविपरिणामिनो हि सर्वे भावाः“ (समस्त घट आदि पदार्थ प्रतिक्षण परिवर्तनशील है) इस
न्याय से हर एक क्षण में रूपान्तर को प्राप्त होनेवाले जगत् के धर्मों में अनुवर्तमान स्थायी सत्स्वरूप
आत्मा, स्वप्न की नाई, स्वस्वरूप में ही छः प्रकार के भाव-विकारो से युक्त दृश्य पदार्थो की प्रतिक्षण
कल्पना कर रहा अनुभव करता है, यही जीवन्मुक्तो का निश्चय होने के कारण उनको हर्ष आदि की
प्राप्ति कैसे हो सकती है, इस आशय से कहते है।
जैसे रात्रि में निमेष-निमेष में यानी क्षण क्षण में होनेवाली भिन्न-भिन्न स्वप्न दृष्टियाँ क्षणभर में
उत्पत्ति ओर विनाश से युक्त होती हे, वैसे ही ये लोकदृष्टियाँ भी क्षण-क्षण में उत्पत्ति ओर विनाश से
युक्त होती है