Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
आमोदस्य यथा पुष्पं शौक्ल्यस्य तुहिनं यथा ।
तथैष रस आधारश्चित्तस्याभिन्नतां गतः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रकृत तत्त्वज्ञ उदासीन पुरुष की नाई अवस्थित
रहता है । परम्पराक्रम से सम्प्राप्त कर्मो में प्राप्त हुए इष्ट ओर अनिष्ट फलों को न चाहता हे, न द्रेष
करता है, न शोक करता है ओर न प्रसन्न होता है