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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 54

तिरपनवाँ सर्ग समाप्त चौवनवाँ सर्ग संकल्प की जैसे उत्पत्ति होती है, जैसे उसका स्वरूप है, जैसे वह घनता को प्राप्त होता है ओर जिस उपाय से उसका उच्छेद होता है, इन सबका वर्णन ।

35 verse-groups

  1. Verse 1पुत्र ने कहा : हे तात, यह संकल्प केसा है ? हे प्रभो, यह कैसे उत्पन्न होता है, कैसे वृद्धि…
  2. Verse 2दाशूर ने कहा : हे पुत्र, अनन्त, सत्तासामान्यरूपी आत्मतत्त्वरूप चित्‌ की जो विषयोन्मुखता ह…
  3. Verse 3सूक्ष्मरूप से अस्तित्व को प्राप्त हुआ वह संकल्प ही मेघ की नाई चित्ताकाश को चारों ओर से व्…
  4. Verse 4विषयों की अपने से अतिरिक्त की तरह भावना करता हुआ चेतन जैसे बीज अंकुरता को प्राप्त होता हे…
  5. Verse 5उस मूलअकुर से शाखाअंकुरों की तरह बाह्यविषयाकार संकल्प परम्पराओं से संकल्पों की दुःखदायिनी…
  6. Verse 6जैसे समुद्र एकमात्र जलरूप है वैसे ही सारा संसार संकल्पमात्र ही हे, संकल्प को छोड़कर दूसरी…
  7. Verse 7यदि कोई शंका करे, निर्विकार अद्वितीय वस्तु मे बिना बीज के जगत की उत्पत्ति कैसे हुई, तो उस…
  8. Verse 8पूवनुभूत विषयवासनाओं के उद्दुद्ध होने से यह हेय जगद्‌भान्ति हुई है, ऐसा कहते है । जिस पुर…
  9. Verse 9असत्य ही तुम उत्पन्न हुए हो ओर असत्य ही स्थित हो, मेरे इस उपदेशरूप शास्त्र के ज्ञात होने…
  10. Verse 10यह जो वेदान्तो में प्रसिद्ध पूर्णात्मा है, वह मैं ही हू, मेरे ये सुख-दुःखमय जन्मादि विकार…
  11. Verse 11इस जन्म आदि के सम्बन्धी तुम कभी न होते हुए भी भ्रान्ति से उत्पन्न हुए हो । तो विवेक पूर्ण…
  12. Verse 12तब इस भ्रम की निवृत्ति के लिए कौन-सा उपाय है, ऐसा प्रश्न होने पर भ्रमनिवृत्ति का उपाय कहत…
  13. Verse 13संकल्प के क्षय से सब भयो का नाश हो जाता है और पूर्वभावों की भावना न करने से संकल्प का नाश…
  14. Verse 14यह उपाय अत्यन्त सरल है, यों उसकी प्रशंसा करते हैं। शिरीष आदि फूलों को और कोमल पल्लवो को म…
  15. Verse 15हे पुत्र, फूल को मसलने के लिए हाथ की चेष्टारूप यत्न का उपयोग होता है, लेकिन इस संकल्पविना…
  16. Verse 16जिस पुरुष को संकल्प का विनाश करना हो, वह भावना के अस्मरण से आधे पलक में ही अनायास उसका वि…
  17. Verse 17संकल्प का क्षय होने से दुःखक्षय होने पर भी निरतिशय आनन्द की प्राप्ति किस उपाय से हो सकती…
  18. Verse 18हे मननशील पुत्र, संकल्प से ही संकल्प का ओर मन से ही अपने मन का उच्छेद करो यानी असंकल्पन क…
  19. Verse 19हे महामते, संकल्प के शान्त होने पर यह सारा संसारदुःख जड से उपशान्त हो जाता है । भाव यह कि…
  20. Verse 20संकल्प के शान्त होने पर भी जीव, चित्त, वासना आदि से दुःख होया ही । एसी आशंका करके चित्त आ…
  21. Verse 21संकल्प के सिवा यहाँ कहीं पर कुछ भी नहीं हे, इसलिए हृदय से संकल्प को ही तुम दूर करो । व्यर…
  22. Verse 22यदि कोई शंका करे, संकल्प ही यदि जीव और जगद्रूप है, तो उसका नाश होने पर नैरात्म्यरूप शून्य…
  23. Verse 23यदि कोई शंका करे कि एक बार बाधित होकर भी यह जगत भावना से पुनःहोगा इस पर कहते हैं । यह सार…
  24. Verse 24इसलिए भावना के उच्छेद को चाहनेवाले पुरुष को सबसे पहले जगत मिथ्या है, ऐसा ज्ञान प्राप्त कर…
  25. Verse 25पुरुष दृश्य के अनादर से देह में आत्मत्व को अनुसन्धानवश होनेवाले सुखदुःखों से लिप्त नहीं ह…
  26. Verse 26आदर का अभाव होने पर हर्ष, क्रोध तथा जन्म-मरण आदि नहीं होते हैं, इसलिए सुख, दुःख आदि की भ्…
  27. Verse 27मन ही चित्‌ के प्रतिबिम्ब से जीव होकर मनोरथ से कल्पित नगररूपी भूत, भविष्य ओर वर्तमान जगत…
  28. Verse 28कैसे पूर्वोक्त रीति से परिवर्तन करता हुआ स्फुरित होता है ? उस पर कहते हैं। लोक में मन विष…
  29. Verses 29–30तब वह इष्ट वस्तु ही क्यो नहीं करता है, अनिष्ट वस्तु को क्यो करता है ? ऐसी शंका होने पर कह…
  30. Verses 31–33यह बड़े और छोटे आकार का कैसे हो जाता है ? इस पर कहते हैं। संकल्परूपी जलतरंगों का नियन्त्र…
  31. Verses 34–38किन्तु यह असन्मय ही है, इसलिए इसका सुखपूर्वक निवारण किया जा सकता हे । जगत सत्य है, इस पक्…
  32. Verse 39असत्य विकल्पों से युक्त मिथ्या संसार को इतने समय तक जो तुमने नहीं जीता, यह उपाय न जानने क…
  33. Verse 40विचार से संसार स्वनिष्ठबाध को ऐसे प्राप्त होता है जैसे कि दीपक का प्रकाश होने पर अन्धकारव…
  34. Verse 41हे पुत्र, यह संसार न तो तुम्हारा सम्बन्धी है और न इसके सम्बन्धी तुम हो । तुम यह मेरा सम्ब…
  35. Verse 42संसारी स्वभाववाले मेरे ये महासमृद्धियों से दैदीप्यमान भोगविलास सत्य है, ऐसा व्यर्थ भ्रम त…