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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 54, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 54, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

काकतालीययोगेन संजातोऽस्ति मुधैव हि । मृगतृष्णाद्विचन्द्रत्वभिवासत्यं च वर्धते ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे, निर्विकार अद्वितीय वस्तु मे बिना बीज के जगत की उत्पत्ति कैसे हुई, तो उस पर कहते है। काकतालीय न्याय से यह संसार मिथ्या ही उत्पन्न हुआ है । विवर्तवाद के आश्रय से उक्त दोष का परिहार करना चहिए, इस आशय से कहते हैं - मृगजल ओर द्विचन्द्रत्व के समान यह असत्य ही वृद्धि को प्राप्त होता है