Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 54, Verses 29–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 54, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
आत्मनः सदृशीं लीलां जीवो हृद्वनमर्कटः ।
दीर्घमाकारमादाय निमेषाद्याति ह्रस्वताम् ॥ २९ ॥
ग्रहीतुं च न शक्यन्ते संकल्पजलवीचयः ।
मनाग्दृष्टा विवर्धन्ते ह्रसन्ति सपरिच्छदाः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
तब वह इष्ट वस्तु ही क्यो नहीं करता है, अनिष्ट वस्तु को क्यो करता है ? ऐसी शंका होने पर
कहते हैं।
हृदयरूपी वन का बन्दर जीव अपने स्वभाव के अनुरूप लीला करता है। बड़े आकार को प्राप्त कर
क्षणमात्र में छोटा बन जाता है