Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 54, Verses 31–33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 54, verses 31–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 31-33
संस्कृत श्लोक
तृणमात्रेण दीप्यन्ते संकल्पा वह्निशेषवत् ।
जगत्यप्रकटाकाराः प्रदीप्ताः क्षणभङ्गुराः ॥ ३१ ॥
भ्रमदा जडसंस्थानाः संकल्पास्तडिदग्नयः ।
यदेवासन्मयं पुत्र तदेवाशु चिकित्सितुम् ॥ ३२ ॥
शक्यते नात्र संदेहो नासत्सद्भवति क्वचित् ।
संस्थितो यदि संकल्पो दुश्चिकित्स्यः स्वतो भवेत् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
यह बड़े और छोटे आकार का कैसे हो जाता है ? इस पर कहते हैं।
संकल्परूपी जलतरंगों का नियन्त्रण किसी से नहीं किया जा सकता । विषयों के थोड़े दर्शन से
उद्बुद्ध हुई वे बढ़ती हैं और विषयों के दर्शन और स्मरण का त्याग होने पर अपने परिवार के साथ हास
को प्राप्त होती हैं ॥ ३ ०॥ जैसे अग्नि की चिनगारी केवल एक तृण से प्रदीप्त हो उठती है वैसे ही संकल्प
तृणतुल्य अल्पविषय से भी प्रदीप्त होते हैं। जैसे बिजली की अग्नियों का आकार गुप्त रहता है, कभी
चमक कर वे क्षणभर में नष्ट हो जाता है, ठुंठ आदि में चोर की भ्रान्ति उनसे होती है, मेघ स्थित जल में
उनकी स्थिति रहती है वैसे ही संकल्पो का भी आकार गुप्त रहता है, वे प्रदीप्त होकर क्षण भर में नष्ट
हो जाते हैं । खम्भे आदि में चोर सब भ्रान्ति के हेतु हैं और जड़ विषयों में उनका निवास है।
इस प्रकार “'कीट्ृशस्तात संकल्पः“ (हे तात संकल्प किस प्रकार का है) इत्यादि प्रश्नों का उत्तर
कहकर “कर्थं चैषविनश्यति““ (किस प्रकार इसका विनाश होता है) इस अन्तिम प्रश्न का उत्तर कहने
के लिए पूर्वोक्त संकल्प का निवारण कोई कठिन काम नहीं है, ऐसा कहते हैं।
हे पुत्र, जो भी वस्तु असन्मय (मिथ्या) है उसीका ज्ञान से शीघ्र निवारण किया जा सकता है, इसमें
कुछ भी सन्देह नहीं है । असत् वस्तु कभी सद् नहीं हो सकती हे । यदि संकल्प परमार्थभूत होता, तो वह
स्वतः ही अनिवार्य हो जाता