Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 54, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 54, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
लेशतः प्राप्तसत्ताकः स एव घनतां शनैः ।
याति चित्तखमापूर्य दृढजाड्याय मेघवत् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
सूक्ष्मरूप से अस्तित्व को प्राप्त हुआ वह संकल्प ही मेघ की नाई चित्ताकाश को चारों ओर से व्याप्त
करके अधिष्ठान चैतन्य की चित्स्वभावता के तिरोधान द्वारा जड़ प्रपंचाकार की प्राप्ति के लिए धीरे-
धीरे घनता को प्राप्त होता है