Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 41
चालीसवाँ सर्ग समाप्त इकतालीसवों सर्ग अनिर्वचनीय, चिकित्सा के योग्य, अविचिन्त्य ओर मिथ्या माया कलना आदि विशेष धर्मो का मूल है, यह वर्णन |
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- Verses 1–2श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्, पूर्व सर्गो मे सब जग्रह मन आदि द्वैत कल्पना का मूल कल…
- Verse 3अनन्त अतएव प्रमाण से अपरिच्छेद्य, पूर्ण, सदा स्वतः भासमान आत्मा को, जिसकी परमार्थस्वरूपप्…
- Verse 4आपका यह व्यामोह वाक्य के दोष से नहीं है, किन्तु आपके तात्पर्य में ध्यान न देने रूप मेरे क…
- Verse 5यदि श्रीरामचन्द्रजी कहे कि कब मुझे तात्पर्यज्ञान होगा ? तो इस पर कहते है । ज्ञानदुष्टि के…
- Verse 6यदि कोई कहे कि जैसे मेरी माता वन्ध्या है, मेरे मुख में जिह्वा नहीं है, मैं गूँगा हूँ, ये…
- Verse 7तो कब तक शब्द अर्थ ओर वाक्यरचना के भ्रम का अनुसरण करना चाहिए, इस पर कहते हैं। जब उस सत्य,…
- Verse 8यदि कहें कि वाक्यार्थज्ञान कैसे होगा ? तो इस पर कहते हैं। उपदेश देने के योग्य शिष्यों के…
- Verse 9यह शब्दार्थरूप वाक् प्रपंच सद् उपदेश के विषय में अज्ञों मे कल्पित है, न कि वाक्यार्थ को…
- Verse 10पूर्वोक्त कलना, उसके निमित्तभूत पूर्वसंस्कार तथा कर्मरूपी मल एवं अविद्या आदि कुछ भी आत्मा…
- Verse 11हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, सिद्धान्त के अवसर पर असंभावना के नष्ट हो जाने के बाद निर्वाण…
- Verse 12तो इस समय में आपका वाकृप्रपंच किसलिए है, इस पर कहते हैं। वाकृप्रपंच के बिना इस कारणीभूत अ…
- Verse 13उपदेशरूप वाकृप्रपंच और तज्जन्य ज्ञान अज्ञान के कार्य हैं। ऐसी अवस्था में वे अज्ञान के विर…
- Verse 14परस्पर विरोध का उपपादन करते हैं। अस्त्र अस्त्र से ही शान्त होता है, मल से (सज्जी से) ही म…
- Verse 15वह स्वयं अपनी नाशक कैसे हो सकती है ? एक में कर्तृता तथा कर्मता का सम्भव नहीं हो सकता, यदि…
- Verse 16उसके असम्भावित अनन्त कार्य देखे जाते हैं, इसलिए भी विरोध की सम्भावना नहीं है, इस आशय से क…
- Verse 17यह जब तक विचारगोचर नहीं होती, तभी तक स्फुरित होती है, विचारित होने पर नष्ट हो जाती है जब…
- Verse 18ओह ! संसार को बाँधनेवाली यह माया सचमुच बड़ी विचित्र हे । यद्यपि वह असत्य है, तथापि इसने अ…
- Verse 19जिस कारणवश संसार माया अत्यन्त भेदरहित उस परम पद में विस्तृत भेद का विस्तार कर रही है, उसी…
- Verse 20यह माया वस्तुतः नहीं हे, इस भावना के आचार्योपिदेश, श्रुतिवाक्य, तर्क ओर स्वानुभव के अभ्या…
- Verse 21अभी तो मेरे वचन के विश्वास से परोक्ष के तुल्य मुख से कहे गये अर्थ का ग्रहण कीजिए, ऐसा कहत…
- Verse 22पूर्वोक्त निश्चय को निश्वल करने मे हेतु कहते है । जो यह साक्षी से दृश्यता को प्राप्त मनोव…
- Verse 23इस तरह मनन का निरास होने पर मन काष्ठरहित अग्नि की भाँति स्वयं शान्त हो जाता है, अतएव ब्रह…
- Verse 24असत् यानी अतीत, सत् यानी वर्तमान यों दो रूपवाले मनन के विषय में “यह सत्य ही है या यह अस…
- Verses 25–26तो कौन निमग्न होता है, इस पर कहते हैं। मिथ्याभूत वेहेन्द्रियादि द्वेतभावनाओमे जिसकी अहंबु…
- Verse 27ऐसा होने पर तो तत्त्ववेत्ता पुरुषों की पूर्वापरार्थविषयक भावना के अभाव से व्यवहार की सिद्…
- Verse 28इस व्यवहार के बिना ये शास्त्रदृष्टियाँ तन्तुहीन पट की भाँति स्थिति को प्राप्त नहीं होती
- Verse 29यदि अविद्या है ही नहीं, तो शास्त्र किसलिए है 2 इस पर कहते हैं। अविद्यारूपी नदी में बह रहा…
- Verse 30हे श्रीरामचन्द्रजी, परमात्मा की प्राप्ति के बिना अविद्यारूपी नदी का पार नहीं मिलता है। अव…
- Verse 31यदि कोई कहे कि यह अविद्या परमात्मा में कहाँ से आई ? इस पर कहते हैं। यह मलदायिनी अविद्या च…
- Verses 32–33हे श्रीरामचन्द्रजी, यह अविद्या कहाँ से प्राप्त हुई, ऐसा विचार आप मत कीजिये | इसका कैसे ना…
- Verses 34–39तो क्या यह अनादि है अथवा सादि है। यदि अनादि है, तो आत्मा की तरह नित्य होगी । यदि सादि है,…