Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 41, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 41, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
ईदृशी राम मायेयं यां स्वनाशेन हर्षदा ।
न लक्ष्यते स्वभावोऽस्याः प्रेक्ष्यमाणैव नश्यति ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
वह स्वयं अपनी नाशक कैसे हो सकती है ? एक में कर्तृता तथा कर्मता का सम्भव नहीं हो सकता,
यदि कोई ऐसी शंका करे, तो क्रिया में कर्मकर्तुभाव का विरोध होता है, न कि ज्ञान से अज्ञान के बाघ में
विरोध है, इस आशय से कहते है ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, यह माया ऐसी है, जो अपने विनाश से हर्ष देती हे । इसका कुछ भी स्वभाव
लक्षित नहीं होता है, यह ज्ञानदृष्टि से विचारविषय होते ही नष्ट हो जाती है