Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 41, Verses 34–39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 41, verses 34–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
यत एषा यथा चैषा यथा नष्टेत्यखण्डितम् ।
वस्तुतः किल नास्त्येषा विभात्येषा न वेक्षिता ॥ ३४ ॥
असतो भ्रान्तता सत्यरूपां जानातु कः कुतः ।
जातेयं प्रौढिमापन्ना दोषायैवातताकृतिः ॥ ३५ ॥
बलात्प्रणाशय त्वेनां परिज्ञास्यसि वै ततः ।
अपि शूरा अतिप्राज्ञास्ते न सन्ति जगत्त्रये ॥ ३६ ॥
अविद्यया ये पुरुषा न नाम विवशीकृताः ।
तदस्या रोगशीलाया यत्नं कुरु विनाशने ॥ ३७ ॥
यथैषा जन्मदुःखेषु न भूयस्त्वां नियोक्ष्यति ।
सर्वापदामेकसखीमज्ञानतरुमञ्जरीम् ।
अनर्थसार्थजननीमविद्यामलमुद्धर ॥ ३८ ॥
भयविषाददुराधिविपत्प्रदां हृदयमोहमहापटलांकुराम् ।
भृशमपास्य कुदृष्टिमिमां बलाद्भव भवार्णवपारमुपागतः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
तो क्या यह अनादि है अथवा सादि है। यदि अनादि है, तो आत्मा की तरह नित्य होगी । यदि सादि
है, तो इसका कारण कहना चाहिए। इसी तरह यह सत्य है, अथवा असत्य है । यदि सत्य है, तो ज्ञान से
इसकी निवृत्ति नहीं हो सकती । यदि असत्य है, तो संवादी व्यवहार का हेतुत्व ही अनुपपन्न हो जायेगा ।
इस तरह की हजारों शंकाओं का नाश उसके नाश से ही हो जायेगा, इस आशय से कहते हैं।
हे रघुकुलदीपक श्रीरामचन्द्रजी, इस अविद्या के अस्त होने अतएव क्षीण होनेपर आप यह जहाँ से
आई, जैसे आई और जैसे नष्ट हुई, यह सब अच्छी तरह समझ जायेंगे ॥ ३ ३॥
असत्य का सत्य के तुल्य विचार स्वाप्निक पुरुष के गोत्र की चिन्ता की भाँति व्यर्थ है, इस आशय
से कहते हैं।
वस्तुतः यह है ही नहीं, विचार न करने पर ही यह भासित होती है। असत् की भ्रान्ति की सत्यरूपता
कौन कैसे जान सकता है ?