Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 41, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 41, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
क्षीरोदकुक्षितुल्याभिः शीतलामलदीप्तिभिः ।
तवोक्तिभिर्विचित्राभिर्गम्भीराभिरिवाभितः ॥ १ ॥
क्षणमान्ध्यमिवाप्नोमि क्षणं यामि प्रकाशताम् ।
शान्तातपलवः प्रावृड्लोलाभ्र इव वासरः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्, पूर्व सर्गो मे सब जग्रह मन आदि द्वैत कल्पना का मूल कलना ही
है, यह कहा गया है । अब निर्विकार, अद्वितीय आत्मा मेँ कलना के निमित्त की भी असंभावना कर रहे
श्रीरामचन्द्रजी उसको पूछने की इच्छा से गुरु श्रीवसिष्ठजी के सम्मानार्थ पहले कहे हुए वचन की
प्रशंसा करते हुए अपने व्यामोह को प्रकट करते है ।
क्षीरसागर के गर्भ के यानी चन्द्रमा के तुल्य अतएव शीतल, निर्मल कान्ति से पूर्ण, विचित्र तथा सब
ओर से गम्भीर-सी आपकी उक्ति से वर्षा ऋतु में चंचल बादलों से युक्त तथा शान्त सूर्यप्रकाशवाले
दिन के समान मैं क्षण भर में अन्धकारता को (व्यामोह को) तथा क्षण भर में प्रकाशता को प्राप्त हो रहा
हूँ
सर्ग सन्दर्भ
चालीसवाँ सर्ग समाप्त इकतालीसवों सर्ग अनिर्वचनीय, चिकित्सा के योग्य, अविचिन्त्य ओर मिथ्या माया कलना आदि विशेष धर्मो का मूल है, यह वर्णन |