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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 41, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 41, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

अविद्ययैवोत्तमया स्वात्मनाशोद्यमेच्छया । विद्या सा प्रार्थ्यते राम सर्वदोषापहारिणी ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

उपदेशरूप वाकृप्रपंच और तज्जन्य ज्ञान अज्ञान के कार्य हैं। ऐसी अवस्था में वे अज्ञान के विराधी कैसे होगे अथवा अज्ञान स्वविराधी ज्ञान को कैसे चाहेगा ? यदि कोई ऐसा कहे, तो उस पर कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, बहुत जन्मों से संचित सुकृत से विशुद्ध अन्तःकरण के आकारमें परिणत हुई अविद्या ही अपने नाश के उद्यम की इच्छा से सम्पूर्ण दोषों को दूर करनेवाली विद्या की इच्छा करती है । जैसे अपने शरीर से विरोध होने पर भी स्वात्महित होने के कारण विवेकिनी पतिव्रता पतिचितारोहण करती हे वैसे ही उसे विद्या की इच्छा हो सकती है, यह भाव है