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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 41, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 41, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 41 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

उपदेश्योपदेशार्थं शास्त्रार्थप्रतिपत्तये । शब्दार्थवाक्यरचनाभ्रमो मा तन्मयो भव ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि जैसे मेरी माता वन्ध्या है, मेरे मुख में जिह्वा नहीं है, मैं गूँगा हूँ, ये वाक्य बाधितार्थक हैं वैसे ही नेह नानाऽस्ति किचन” 'एकमेवा5द्वितीयम्‌” इत्यादि श्रुतियाँ भी है, इसलिए कैसे विरोध का परिहार होगा ? इस पर कहते हैं। शिष्यों के उपदेशार्थ शास्त्रार्थ के ज्ञान के लिए शब्द, अर्थ तथा वाक्य रचना का भ्रम है। आप तन्मय न होइए। भाव यह है कि असत्य स्वप्न आदि भी जैसे सत्य वस्तु के ज्ञान के उपाय होते हैं वैसे ही शब्द, अर्थ ओर वाक्यरचना का भ्रम भी सत्य शात्त्रार्थ का हेतु होता है, इसलिए व्यामोहवश आप भ्रममय न होइए