Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 19
34 verse-groups
- Verse 1उन्नीस्वों सर्ग उपासनाओं के अनुसार फल की प्राप्ति, ज्ञानोपाय से सत्य आत्मा में अवस्थान ओर…
- Verse 2जैसे केले के पत्ते एक के भीतर एक रहते हैं और ओर जैसे धरातल के गर्भ में नाना प्रकार के कीड…
- Verse 3यदि कोई कहे आन्तर और बाह्य सभी जीवों का समान ही अधिष्ठान है, ऐसी स्थिति में आन्तरत्व की क…
- Verse 4अथवा पुरुष के पूर्व जन्म के प्रयत्नरूप कर्म से सब व्यवस्थाओं की सिद्धि होती है, इस आशय से…
- Verse 5कर्म और उपासना के तारतम्य के अनुसार देवताओं के सायुज्य में भी तत्-तत् देवतारूपी जीवों क…
- Verse 6भार्गवोपाख्यान भी पूर्वोक्त अर्थ में दृष्टान्त है, ऐसा कहते है । जो प्रथम दृष्ट अप्सरारूप…
- Verse 7इसी तरह यह अव्युत्पन्न, मूढ संवित् जैसी व्युत्पत्ति से युक्त की जाती है, वैसी ही हो जाती…
- Verse 8संवित् कब बाल रहती है और कब प्रौढ़ होती है, यह विशेषता जानने के लिए जाग्रत और स्वप्न दशा…
- Verse 9बार-बार संवादयुक्त प्रतीति से प्राप्त स्थिर प्रतीति की योग्यता ही जाग्रत के पदार्थों में…
- Verse 10यदि स्वप्न भी कालान्तर में स्थित है, तब तो जाग्रतरूप होने से क्षणमात्र में यह जाग्रत ही ह…
- Verse 11स्थिरता और अस्थिरता के बिना जाग्रत और स्वप्न की दशाओं मे भेद नहीं है, क्योंकि इन दोनों दश…
- Verse 12स्वप्न भी स्वप्न के समय में स्थिर होने के कारण जाग्रतभाव को प्राप्त होता है और जाग्रत के…
- Verse 13स्वप्न भी, हरिश्चन्द्र के बारह वर्षवाले स्वप्न की भाँति जिसकी स्थिरता जाग्रदूबुद्धि से ग्…
- Verse 14जब तक जो वस्तु स्थिर समझी जाय तब तक वह जाग्रत कही जाती है। क्षणमात्र में उसका भंग होने पर…
- Verse 15प्रतिज्ञात विषय के वर्णन की भूमिका के रूप में स्वप्नद्रष्टा की जीव की सत्ता को सिद्ध करते…
- Verse 16यदि कोई कहे देह में जीव रहे, पर उसकी रूप आदि की दशा के लिए प्रवृत्ति में क्या हेतु है ? इ…
- Verse 17जीव चेतन के भीतर सब नाड़ियों मेँ संचार करने पर सब संवित् (ज्ञान) उदित होती है । पहले अनु…
- Verses 18–19नेत्र आदि छिद्रों में संचार कर रही संवित् नाना प्रकार के आकार और विकारों से सम्पन्न बाह्…
- Verse 20वाचिक और कायिक विक्षेप की निवृत्ति होने पर स्वप्न का उदय होता है, मानिक विक्षेप की भी यदि…
- Verse 21जैसे कि विक्षेपशून्य प्रकाश का एकमात्र निमित्त दीपक निर्वाति (वायुरहित) घर में क्षोभ को प…
- Verse 22उससे शरीर के भीतर स्थित नाड़ियों मे संवित् का संचार नहीं होता; अतः पुरुष विक्षोभ को प्रा…
- Verse 23यदि कोई शंका करे कि सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतोभवति" (हे सौम्य, सुषुप्ति के समय…
- Verse 24यदि शंका हो कि तब “(तीर्णो हि तदा सव्िकान् हदयस्य भवति (हदय में स्थित बुद्धि से सव शोको…
- Verse 25प्रसंगतः जीव की तुयविस्था दिखलाते हैं। चित्त के उपरत होने पर सकल व्यवहारों के उपराम से यु…
- Verse 26प्रस्तुत सुषुप्ति का ही अनुवाद करके उससे पहले पूर्वोक्त स्वप्नावस्था का विस्तार करने के ल…
- Verse 27उससे स्वप्नदर्शन को कहते है । उस समय जैसे योगी बीज में स्थित वृक्ष को अपनी यौगिक शक्ति से…
- Verse 28सुप्त जीव चेतन जब प्राण वायुओं से थोड़ा बहुत क्षुब्ध होता है तब “मैं हूँ” ऐसा अपने को अहं…
- Verse 29जैसे फूल अपनी सुगन्धि का अपने अन्दर ही अनुभव करता हे वैसे ही जब-जब नाडी के अन्दर स्थित श्…
- Verse 30जब यह जीवचेतन नाडी के अन्तर्गत पित्त से आक्रान्त होता है, तब बाहर की तरह सम्पूर्ण ग्रीष्म…
- Verse 31नाड़ी के अन्दर स्थित रुधिर से आप्लावित होकर गेरु आदि धातुओं से व्याप्त प्रदेशों को और लाल…
- Verse 32वह जीवचेतन जिस-जिस वासना का सेवन करता है यानी जिस वासना से वासित अन्तःकरणवाला होता हे, नि…
- Verse 33प्राणवायु से भीतर ही क्षुब्ध हुआ, अतएव इन्द्रियच्छिद्रों पर अपने आक्रमणों से रहित जीव अपन…
- Verse 34जब वायु से क्षुब्ध हुआ जीव इन्द्रिय छिद्रों का आक्रमण करनेवाला होकर बाहर शब्द आदि को देखत…
- Verse 35अनर्थ है; इसलिए उसी का त्याग करना चाहिए, ऐसा कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार ज्ञा…