Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
जीवबीजं परं ब्रह्म सर्वत्र खमिव स्थितम् ।
तेन जीवोदरजगत्यपि जीवोऽस्त्यनेकधा ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
उन्नीस्वों सर्ग
उपासनाओं के अनुसार फल की प्राप्ति, ज्ञानोपाय से सत्य आत्मा में अवस्थान ओर
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय अवस्था में स्थिति का वर्णन |
यदि जीवों के अन्दर जीवपरम्परा की कल्पना की जायेगी, तो बाह्य जीव ही आन्तरजीवो के
अधिष्ठान होगे । इस तरह आन्तर-आन्तर जीवों की मुक्ति स्वाधिष्ठानभूत बाह्य-बाह्य जीवात्म-
भावचिन्तन से बाह्य-बाह्य जीवात्मभावप्राप्ति द्वारा बाह्य जीवो के अधिष्ठानभूत ब्रह्मात्मभावबोधका
उदय होने पर बाह्य जीवों की मुक्ति से ही सिद्ध हो सकती है, न कि साक्षात् ब्रह्मात्मावबोध से उनकी
मुक्ति सिद्ध हो सकती है, क्योकि जीवों के मध्य मे ब्रह्मसत्ता के असन्निधान से अधिष्ठानत्वरूप
आन्तरजगत्बीजता का ब्रह्म मे असम्भव है । यदि आन्तरजगद्बीजता का ब्रह्म में सम्भव हो, तो सभी
आन्तर-बाह्य जीव तुल्य ही है । जीवो के आन्तरत्व की कल्पना असम्भव हो जायेगी, ऐसी आशंका
करके जीवोदरवर्ती जगज्जालं का भी ब्रह्म ही अधिष्ठान बीज है, यह सिद्ध करते है।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जीवों का अधिष्ठानरूप बीज ब्रह्म ही सब जगह आकाश
की भाँति स्थित है, सब जगह स्थित रहने के कारण ही जीवोदरवर्ती जगत में भी अनेक जीव स्थित
हैं