Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
ज्ञात्वा वैचित्युपरते साम्यं व्यवहरन्नपि ।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तेषु संबुद्धस्तुर्यवान्स्मृतः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रसंगतः जीव की तुयविस्था दिखलाते हैं।
चित्त के उपरत होने पर सकल व्यवहारों के उपराम से युक्त चित्त में शास्त्र से अविषमता का ज्ञान
कर विचार और एकाग्रता से साक्षात्कार को प्राप्त हुआ योगी प्रसिद्ध जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्तियों में
अथवा पूर्वोक्त भूमिका हो तो उसमें व्यवहार करता हुआ ओर समाधि में स्थित रहता हुआ भी ज्ञान की
दृढ़ता से तुर्य आत्मस्वभाव से च्युत न होकर सदा ही तुर्यावस्थावान कहा जाता है