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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, Verse 27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

स्वान्तःसंस्थजगज्जालं भावाभावैः क्रमभ्रमैः । पश्यति स्वान्तरेवाशु स्फारं बीज इव द्रुमम् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

उससे स्वप्नदर्शन को कहते है । उस समय जैसे योगी बीज में स्थित वृक्ष को अपनी यौगिक शक्ति से आगे होनेवाले विस्तार से युक्त देखता है वैसे ही भाव ओर अभावरूप क्रमिक भ्रमों से अपने हृदय में स्थित जगज्जाल को अपने भीतर ही तुरन्त देखता है