Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
देवान्देवयजो यान्ति यक्षा यक्षान्त्व्रजन्ति हि ।
ब्रह्म ब्रह्मयजो यान्ति यदतुच्छं तदाश्रयेत् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
कर्म और उपासना के तारतम्य के अनुसार देवताओं के सायुज्य में भी तत्-तत् देवतारूपी जीवों
के भीतर ही तारतम्यरूप से भोग की प्रसिद्धि शास्त्ररूप प्रमाण से सिद्ध है, इस आशय से कहते हैं।
देवताओं की पूजा करनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, यक्षों की पूजा करनेवाले यक्षों को प्राप्त
होते हैं और हिरण्यगर्भ और परब्रह्म की उपासना करनेवाले हिरण्यगर्भ और परब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
इनमें से किसको प्राप्त करना चाहिये ? इस पर कहते हैं।
जो तुच्छ न हो यानी सर्वोत्तम हो, उसीका आश्रय करना चाहिये